मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य से अमृतत्व साधन विषयक प्रश्न किया:-
येन अहं न अमृता स्यां किम अहं तेन कुर्याम । (वृहदारण्यक उपनिषद 2/4/3)
अर्थात - जिससे मै अमर नहीं हो सकती , उसे लेकर मैं क्या करूँगी ?
ऎसा मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य की उस इच्छा के बाद जिसमें उन्होने कात्यायनी और मैत्रेयी में सम्पति विभाजन हेतु व्यक्त किया ।
यह सर्वकालिक सत्य उस ओर इशारा करता है जिसमें हम सब एक निश्चित कालावधि के पश्चात प्रकृति में लय हो जाते हैं।
ईशावास्योपनिषद में लिखा है:-
अविद्यायाम मृत्युं तीर्त्वा विद्यायाम अमृतम अश्नुते ।(11)
पुनश्च अधिक स्पष्ट किया है -
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यां अमृतं अश्नुते । (14)
उम्मीद है बात समझ में आ रही होगी ।
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