रविवार, 23 अगस्त 2009

अनुभूत शक्तिशाली कविता


अनुभूत शक्तिशाली कविता, मंत्रवत जाप से शक्ति आती है

(उदघोषणा : यह मेरी कविता नहीं है)

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,

चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है.

मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,

चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है.

आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,

जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है.

मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,

बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में.

मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,

क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो.

जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,

संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम.

कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

ओशो की समाधि पर लिखे निम्न वाक्य का अभिप्राय निश्चय ही जन्म मृत्यु के भेद का वेधन करने के लेये पर्याप्त होगा :-
"OSHO. Never Born, Never Died. Only Visited this Planet Earth between Dec 11 1931 – Jan 19 1990."
मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य से अमृतत्व साधन विषयक प्रश्न किया:-

येन अहं न अमृता स्यां किम अहं तेन कुर्याम । (वृहदारण्यक उपनिषद 2/4/3)

अर्थात - जिससे मै अमर नहीं हो सकती , उसे लेकर मैं क्या करूँगी ?
ऎसा मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य की उस इच्छा के बाद जिसमें उन्होने कात्यायनी और मैत्रेयी में सम्पति विभाजन हेतु व्यक्त किया ।
यह सर्वकालिक सत्य उस ओर इशारा करता है जिसमें हम सब एक निश्चित कालावधि के पश्चात प्रकृति में लय हो जाते हैं।
ईशावास्योपनिषद में लिखा है:-
अविद्यायाम मृत्युं तीर्त्वा विद्यायाम अमृतम अश्नुते ।(11)
पुनश्च अधिक स्पष्ट किया है -
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यां अमृतं अश्नुते । (14)
उम्मीद है बात समझ में आ रही होगी ।