रविवार, 26 जुलाई 2009

क़बीर की चक्की

कबीर दास अपने समय के सबसे अधिक प्रयोगवादी आध्यात्मिक कवि थे, इन्होने अपने अनुभवों को चक्की के साथ जोडकर उम्र के साथ हुये आध्यात्मिक विकास (spritual evolution) को निम्नवत व्यक्त किया है इसी को समझाने का दुस्साहस या तुच्छ प्रयास प्रस्तुत है:-

(1) प्रथम पडाव:- उमर के उस पडाव (सम्भवतः 18 से20 वर्ष की आयु में) पर जबकि कबीर किशोरावस्था में थे, समाज में भूख और ढोंग फैला हुआ था । व्यग्र मन से तब दुनियावी दिखावों पर प्रहार करते हुये कहा:-

पाहन पूजें हरि मिलें तो मैं पूजूँ पहाड,
यासै तो चाकी भली पीस खाय संसार

(2) द्वितीय पडाव :- कबीर दास जी बडे हुये विवाह इत्यादि सम्पन्न हुआ, आध्यात्म और गृहस्थी दो पाट में जीवन पिस रहा था, द्वन्द विद्यमान था मन में (उम्र 40 - 42 की रही होगी ) सो कहा:

चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोय,
दो पाटन के बीच में साबुत बचा ना कोय।

(3) तृतीय पडाव :- द्वन्द खत्म हो चुका था मन शांत, अंतर्दृष्टि हो चुकी थी, दुनिया में क्या राज काज चल रहा था कोई मतलब नहीं (उम्र 60 के आस पास की ) तो उदगार व्यक्त किया -

चलन दे चाकी तू काहे को रोय,
खूँटी संग जुडा रह , बाल ना बांका होय ।

उम्मीद है बात समझ में आ गयी होगी और चक्की चल रही होगी अपन को क्या लेना देना। ठीक है।

1 टिप्पणी:

  1. अच्छे विचार लेकिन ये उम्र वैराज्ञ की बाते करने की नहीं चुनौतियों से लड़ते हुए उन पर विजय पाने की है. कबीरदास जी तो उम्र के अगले पड़ाव में काम आएंगे

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