शुक्रवार, 24 जुलाई 2009



हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।


हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥





श्री कृष्ण ने गीता के दूसरे अद्ध्याय के 62-63 श्लोक में मानस रोगों की सम्प्राप्ति बतायी है यथा :-





ध्यायतो विषयांपुंसः संगस्तेषुपजायते । संगात्संजायते कामः कामातक्रोधो अभिजायते॥62॥


क्रोधात भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृति विभ्रमः। स्मृति भ्रांशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥63॥

तात्पर्य है कि - किसी विषय पर चिंतन करने से लगाव उत्पन्न हो जाता है, जिससे उसकी कामना करने लगता है, कामना पूर्ण न होने से क्रोध की उत्पत्ति होती है, क्रोध से बुद्धि ढक जाती है, परिणामतः स्मृति नष्ट हो जाती है, जिससे बुद्धि नाश हो जाता है और उससे सर्वनाश हो जाता है ।



ये तो बीमारी के बारे में बता दिया गया है मगर इसका ईलाज कहाँ पर है ?

खोजने पर पास में ही उत्तर मिल गया आदि शंकराचार्य की भज गोविन्दम में - यथा-

सत्संग्त्वे निस्संगत्वम, निस्स्ंगत्वे निर्मोहत्वम ।
निर्मोहत्वे निश्चलत्वम निश्चलतत्वे जीवन्मुक्तिः ॥

तात्पर्य है कि - सत्संग से लगाव (आसक्ति) खत्म होती है, आसक्ति खत्म तो मोह खत्म, मोह नहीं तो मन निश्चल (शांत) और मन शांत तो जीवन मुक्ति । है ना आसान सा ईलाज । हरि बोल ! हरि बोल तो बोलना ही पडेगा।

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