शुक्रवार, 31 जुलाई 2009
हाथी गिरा गढैया में तो मेढकिओ लात मारती है
देयर वर सेवरल फ्रोगस इन इट
दे वेयर व्हेरी स्केयर्ड, व्हेन एवर हथिया नहाने आता
सेवेरल आफ देम - (फ्रागस) दब कर मर जाता
दे क्राई व्हेरी हाई - व्हेनेवेर समवन डाई
वन डे हैप्पैनड रेनी – समथिंग हैप्पैनड अनहोनी
सम फ्रोग क्लाइम्ब्ड ओन अ ट्री
व्हेन एलीफैंट मूवस, ब्रांच शेकस, दे फालेन फ्री
ऍ फ्रोग गाट डाउन आन शोल्डर
होल्डिंग नेक बीयिंग बोल्डर
नीचे से अदर फ्रोग्स टर्राइंग
छोडना मत मार डाल स्याले को !! दे क्राइंग
बहुत दिन बाद गरदन हाथ में आयी है
तभी तो हमारा टेम्पो हाई है
इसीलिये बाप दादा कहा करते थे :-
हाथी गिरा गढैया में तो मेढकिओ लात मारती है
Means when a big elephant type of man is in crisis
Even frogs can kick them.
किसी शायर ने कहा है :-
मुझ पर नसीहत के वार मत कर, ए दोस्त !
वक्त बदलेगा तो तेरी राय भी बदल जायेगी।
रहीम दास जी अंग्रेजी में कक्का जी को कहिन :-
रहिमन सिट सायलेंटली वाचिंग वर्डली वेस ।
बैय़टरमेंट व्हेन कमस्स् मेकिंग नेवर डिलेस ॥
इसलिये इंतजार कीजिये किसी अच्छे वक्त के आने का । समझे !
रविवार, 26 जुलाई 2009
क़बीर की चक्की
(1) प्रथम पडाव:- उमर के उस पडाव (सम्भवतः 18 से20 वर्ष की आयु में) पर जबकि कबीर किशोरावस्था में थे, समाज में भूख और ढोंग फैला हुआ था । व्यग्र मन से तब दुनियावी दिखावों पर प्रहार करते हुये कहा:-
पाहन पूजें हरि मिलें तो मैं पूजूँ पहाड,
यासै तो चाकी भली पीस खाय संसार ।
(2) द्वितीय पडाव :- कबीर दास जी बडे हुये विवाह इत्यादि सम्पन्न हुआ, आध्यात्म और गृहस्थी दो पाट में जीवन पिस रहा था, द्वन्द विद्यमान था मन में (उम्र 40 - 42 की रही होगी ) सो कहा:
चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोय,
दो पाटन के बीच में साबुत बचा ना कोय।
(3) तृतीय पडाव :- द्वन्द खत्म हो चुका था मन शांत, अंतर्दृष्टि हो चुकी थी, दुनिया में क्या राज काज चल रहा था कोई मतलब नहीं (उम्र 60 के आस पास की ) तो उदगार व्यक्त किया -
चलन दे चाकी तू काहे को रोय,
खूँटी संग जुडा रह , बाल ना बांका होय ।
उम्मीद है बात समझ में आ गयी होगी और चक्की चल रही होगी अपन को क्या लेना देना। ठीक है।
शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
श्री कृष्ण ने गीता के दूसरे अद्ध्याय के 62-63 श्लोक में मानस रोगों की सम्प्राप्ति बतायी है यथा :-
ध्यायतो विषयांपुंसः संगस्तेषुपजायते । संगात्संजायते कामः कामातक्रोधो अभिजायते॥62॥
क्रोधात भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृति विभ्रमः। स्मृति भ्रांशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥63॥
तात्पर्य है कि - किसी विषय पर चिंतन करने से लगाव उत्पन्न हो जाता है, जिससे उसकी कामना करने लगता है, कामना पूर्ण न होने से क्रोध की उत्पत्ति होती है, क्रोध से बुद्धि ढक जाती है, परिणामतः स्मृति नष्ट हो जाती है, जिससे बुद्धि नाश हो जाता है और उससे सर्वनाश हो जाता है ।
ये तो बीमारी के बारे में बता दिया गया है मगर इसका ईलाज कहाँ पर है ?
खोजने पर पास में ही उत्तर मिल गया आदि शंकराचार्य की भज गोविन्दम में - यथा-
सत्संग्त्वे निस्संगत्वम, निस्स्ंगत्वे निर्मोहत्वम ।
निर्मोहत्वे निश्चलत्वम निश्चलतत्वे जीवन्मुक्तिः ॥
तात्पर्य है कि - सत्संग से लगाव (आसक्ति) खत्म होती है, आसक्ति खत्म तो मोह खत्म, मोह नहीं तो मन निश्चल (शांत) और मन शांत तो जीवन मुक्ति । है ना आसान सा ईलाज । हरि बोल ! हरि बोल तो बोलना ही पडेगा।
मूर्ति पूजा जरूरी है या नहीं ?
इस विषय पर गुरु जी का उत्तर श्रेष्ठतम आया । श्री श्री बोले मूर्ति पूजा जरूरी है चित्त को एकाग्र करने के लिये, यदि चित्त एकाग्र है और तदात्म स्थापित हो गया है तो इसकी आवश्यकता नहीं। जैसे बस में हम चढते हैं और गंतव्य आने पर उतर जाते हैं, कुछ कुछ ऐसा ही मूर्ति पूजन के बारे में है। ईश प्राप्ति तक अवलम्बन लेना कोई बुरी बात नहीं लेकिन मंजिल प्राप्त होने पर भी बस में बैठे रहना कहाँ की बुद्धिमानी है । आप कहेंगे कि उतरना ही था तो चढे क्यों ? एक का ही पालन करते, मगर हमारा उद्देश्य लक्ष्य की प्राप्ति है ना कि अडियलपन । समझे कि नहीं!
जय गुरुदेव!
सोमवार, 20 जुलाई 2009
चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह । जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥
माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय । एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर । कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥
तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय । कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥
गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥
सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद । कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥
साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय । मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥
कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और । हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर । आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥
बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥
साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥
साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय ।मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥
जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥
उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥
सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥
साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥
शनिवार, 18 जुलाई 2009
शुक्रवार, 17 जुलाई 2009
कबीर का सच
कुमार गन्धर्व के स्वर में अलौकिक आनंद - महसूस करिये :-
उड जायेगा हंस अकेला -2
The Swan will fly away all alone,
जग दर्शन का मेला
Spectacle of the world will be a mere fair
जैसे पात गिरे तरुवर के
As the leaf that falls from the tree
मिलना बहुत दुहेला
Is difficult to find
ना जाने किधर गिरेगा
Who knows where it will fall
लग्या पवन का रेला
Once it is struck with a gust of wind
जब होवे उमर पूरी
When life span is complete
तब छूटेगा हुकुम हुजूरी
Then listening to orders, following others will be over
यम के दूत बडे मरदूत
The messengers of Yama are very strong
यम से पडा झमेला
It's an entanglement with Yama
दास कबीर हर्षे गुन गावै
Servant Kabir Praises the attributes of the Lord
बाहर कोई पार न पावै
outside no one will know that he finds the Lord soon
(Internal everlasting plearsure)
गुरू की करनी गुरू ज़ायेगा
Guru will go according to his doings
चेले की करनी चेला।
The disciple according to his.
बिजली का तार चिडिया का झुला
मंगलवार, 14 जुलाई 2009
आयुर्वेद का एक स्तम्भ ढ्हा
निहायत शरीफ और शांत स्वभाव के थे। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे तथा परिवारजनों को अपार दु:ख सहने की शक्ति प्रदान करे।