मंगलवार, 15 दिसंबर 2009


मौका
(मौलिक रचना है, कोरा गपास्टक नहीं,
न ही चुराई हुयी इसलिये जो कुछ भी करना है बस कर डालो फौरन अभी, फिजाओं के बदलने का इंतजार व्यर्थ है।)

धोखा है,
हवा को आने से
किसने रोका है?

बन्द हैं दरवाजे तो क्या
रास्ते तो बन्द नहीं
बहो पवन सुत – बढो पवन पुत्र
बस यही मौका है।
धोखा है,
हवा को आने से
किसने रोका है?

घबराते सब तूफानों से
बलखाते नौजवानो से
टकराते दीवारों से
जिसने किस्मत को ठोका है।
धोखा है,
हवा को आने से
किसने रोका है?

चीर दीवार का सीना
हरियाली ने मुहँ खोला है
इस पीपल को वहाँ
भला किसने रोपा है?

धोखा है,
हवा को आने से
किसने रोका है?

विस्तार अधिक है तिमिर का
विश्वास अधिक है मगर दिये का
कालिमा के समुद्र को
जिसने पल में सोखा है।
धोखा है,
हवा को आने से
किसने रोका है?

सोमवार, 16 नवंबर 2009

चन्द्रशेखराष्टकं
॥ चन्द्रशेखराष्टकं ॥
॥ अथ चन्द्रशेखराष्टकम् ॥
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहिमाम् ।चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ १॥
रत्नसानुशरासनं रजतादिशृङ्गनिकेतनंसिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युताननसायकम् ।क्षिप्रदघपुरत्रयं त्रिदिवालयैभिवन्दितंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ २॥
पञ्चपादपपुष्पगन्धपदाम्बुजदूयशोभितंभाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रह।म् ।भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशनं भवमव्ययंचन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ३॥
मत्त्वारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीमनोहरंपङ्कजासनपद्मलोचनपुजिताङ्घ्रिसरोरुहम् ।देवसिन्धुतरङ्गसीकर सिक्तशुभ्रजटाधरंचन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ४॥
यक्षराजसखं भगाक्षहरं भुजङ्गविभूषणंशैलराजसुता परिष्कृत चारुवामकलेवरम् ।क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणंचन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ५॥
कुण्डलीकृतकुण्डलेश्वरकुण्डलं वृषवाहनंनारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम् ।अन्धकान्धकामा श्रिता मरपादपं शमनान्तकंचन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ६॥
भषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणंदक्षयज्ञर्विनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम् ।भुक्तिमुक्तफलप्रदं सकलाघसङ्घनिवर्हनंचन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ७॥
भक्त वत्सलमचिञ्तं निधिमक्षयं हरिदम्वरंसर्वभूतपतिं परात्पर प्रमेयमनुत्तमम् ।सोमवारिज भूहुताशनसोमपानिलखाकृतिंचन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ८॥
विश्वसृष्टिविधालिनं पुनरेव पालनतत्परंसंहरन्तमपि प्रपञ्चम शेषलोकनिवासिनम् ।क्रिडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथ समन्वितंचन्द्रशेखर चन्द्रशेकर चन्द्रशेकर रक्षमाम् ॥ ९॥
मृत्युभीतमृकण्डसूनुकृतस्तव शिव सन्निधौयत्र कुत्र च पठेन्नहि तस्य मृत्युभयं भवेत् ।पूर्णमायुररोगितामखिलाथ सम्पदमादरंचन्द्रशेखर एव तस्य ददाति मुक्तिमयत्नतः ॥ १०॥
॥ इति चन्द्रशेखराष्टकम् ॥

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

तेन त्यक्तेन भुंजीथा




ईशावास्योपनिषद का तेन त्यक्तेन भुंजीथा - माने त्याग पूर्वक भोग


इसका जिन्दा उदाहरण चित्रकूट में नाना जी हैं जिनको देख यह ज्ञान होता है कि (घनघोर) कलियुग में ऐसे लोग हैं जो अपने अलावा दूसरों के लिये भी जीतें हैं। मैं अपने को भाग्यशाली मानता हूँ कि ऐसे महान विभूति के दर्शन कर सका।


रविवार, 23 अगस्त 2009

अनुभूत शक्तिशाली कविता


अनुभूत शक्तिशाली कविता, मंत्रवत जाप से शक्ति आती है

(उदघोषणा : यह मेरी कविता नहीं है)

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,

चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है.

मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,

चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है.

आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,

जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है.

मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,

बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में.

मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,

क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो.

जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,

संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम.

कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

ओशो की समाधि पर लिखे निम्न वाक्य का अभिप्राय निश्चय ही जन्म मृत्यु के भेद का वेधन करने के लेये पर्याप्त होगा :-
"OSHO. Never Born, Never Died. Only Visited this Planet Earth between Dec 11 1931 – Jan 19 1990."
मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य से अमृतत्व साधन विषयक प्रश्न किया:-

येन अहं न अमृता स्यां किम अहं तेन कुर्याम । (वृहदारण्यक उपनिषद 2/4/3)

अर्थात - जिससे मै अमर नहीं हो सकती , उसे लेकर मैं क्या करूँगी ?
ऎसा मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य की उस इच्छा के बाद जिसमें उन्होने कात्यायनी और मैत्रेयी में सम्पति विभाजन हेतु व्यक्त किया ।
यह सर्वकालिक सत्य उस ओर इशारा करता है जिसमें हम सब एक निश्चित कालावधि के पश्चात प्रकृति में लय हो जाते हैं।
ईशावास्योपनिषद में लिखा है:-
अविद्यायाम मृत्युं तीर्त्वा विद्यायाम अमृतम अश्नुते ।(11)
पुनश्च अधिक स्पष्ट किया है -
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यां अमृतं अश्नुते । (14)
उम्मीद है बात समझ में आ रही होगी ।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

हाथी गिरा गढैया में तो मेढकिओ लात मारती है

एकदा एन एलीफैंटे फालेन डाउन इन अ पिट ,
देयर वर सेवरल फ्रोगस इन इट
दे वेयर व्हेरी स्केयर्ड, व्हेन एवर हथिया नहाने आता
सेवेरल आफ देम - (फ्रागस) दब कर मर जाता
दे क्राई व्हेरी हाई - व्हेनेवेर समवन डाई
वन डे हैप्पैनड रेनी – समथिंग हैप्पैनड अनहोनी
सम फ्रोग क्लाइम्ब्ड ओन अ ट्री
व्हेन एलीफैंट मूवस, ब्रांच शेकस, दे फालेन फ्री
ऍ फ्रोग गाट डाउन आन शोल्डर
होल्डिंग नेक बीयिंग बोल्डर
नीचे से अदर फ्रोग्स टर्राइंग
छोडना मत मार डाल स्याले को !! दे क्राइंग
बहुत दिन बाद गरदन हाथ में आयी है
तभी तो हमारा टेम्पो हाई है
इसीलिये बाप दादा कहा करते थे :-
हाथी गिरा गढैया में तो मेढकिओ लात मारती है

Means when a big elephant type of man is in crisis
Even frogs can kick them.

किसी शायर ने कहा है :-
मुझ पर नसीहत के वार मत कर, ए दोस्त !
वक्त बदलेगा तो तेरी राय भी बदल जायेगी।

रहीम दास जी अंग्रेजी में कक्का जी को कहिन :-
रहिमन सिट सायलेंटली वाचिंग वर्डली वेस ।
बैय़टरमेंट व्हेन कमस्स् मेकिंग नेवर डिलेस ॥

इसलिये इंतजार कीजिये किसी अच्छे वक्त के आने का । समझे !

रविवार, 26 जुलाई 2009

क़बीर की चक्की

कबीर दास अपने समय के सबसे अधिक प्रयोगवादी आध्यात्मिक कवि थे, इन्होने अपने अनुभवों को चक्की के साथ जोडकर उम्र के साथ हुये आध्यात्मिक विकास (spritual evolution) को निम्नवत व्यक्त किया है इसी को समझाने का दुस्साहस या तुच्छ प्रयास प्रस्तुत है:-

(1) प्रथम पडाव:- उमर के उस पडाव (सम्भवतः 18 से20 वर्ष की आयु में) पर जबकि कबीर किशोरावस्था में थे, समाज में भूख और ढोंग फैला हुआ था । व्यग्र मन से तब दुनियावी दिखावों पर प्रहार करते हुये कहा:-

पाहन पूजें हरि मिलें तो मैं पूजूँ पहाड,
यासै तो चाकी भली पीस खाय संसार

(2) द्वितीय पडाव :- कबीर दास जी बडे हुये विवाह इत्यादि सम्पन्न हुआ, आध्यात्म और गृहस्थी दो पाट में जीवन पिस रहा था, द्वन्द विद्यमान था मन में (उम्र 40 - 42 की रही होगी ) सो कहा:

चलती चाकी देख के दिया कबीरा रोय,
दो पाटन के बीच में साबुत बचा ना कोय।

(3) तृतीय पडाव :- द्वन्द खत्म हो चुका था मन शांत, अंतर्दृष्टि हो चुकी थी, दुनिया में क्या राज काज चल रहा था कोई मतलब नहीं (उम्र 60 के आस पास की ) तो उदगार व्यक्त किया -

चलन दे चाकी तू काहे को रोय,
खूँटी संग जुडा रह , बाल ना बांका होय ।

उम्मीद है बात समझ में आ गयी होगी और चक्की चल रही होगी अपन को क्या लेना देना। ठीक है।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009



हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।


हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥





श्री कृष्ण ने गीता के दूसरे अद्ध्याय के 62-63 श्लोक में मानस रोगों की सम्प्राप्ति बतायी है यथा :-





ध्यायतो विषयांपुंसः संगस्तेषुपजायते । संगात्संजायते कामः कामातक्रोधो अभिजायते॥62॥


क्रोधात भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृति विभ्रमः। स्मृति भ्रांशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥63॥

तात्पर्य है कि - किसी विषय पर चिंतन करने से लगाव उत्पन्न हो जाता है, जिससे उसकी कामना करने लगता है, कामना पूर्ण न होने से क्रोध की उत्पत्ति होती है, क्रोध से बुद्धि ढक जाती है, परिणामतः स्मृति नष्ट हो जाती है, जिससे बुद्धि नाश हो जाता है और उससे सर्वनाश हो जाता है ।



ये तो बीमारी के बारे में बता दिया गया है मगर इसका ईलाज कहाँ पर है ?

खोजने पर पास में ही उत्तर मिल गया आदि शंकराचार्य की भज गोविन्दम में - यथा-

सत्संग्त्वे निस्संगत्वम, निस्स्ंगत्वे निर्मोहत्वम ।
निर्मोहत्वे निश्चलत्वम निश्चलतत्वे जीवन्मुक्तिः ॥

तात्पर्य है कि - सत्संग से लगाव (आसक्ति) खत्म होती है, आसक्ति खत्म तो मोह खत्म, मोह नहीं तो मन निश्चल (शांत) और मन शांत तो जीवन मुक्ति । है ना आसान सा ईलाज । हरि बोल ! हरि बोल तो बोलना ही पडेगा।
जय गुरुदेव श्री श्री महराज की जय
मूर्ति पूजा जरूरी है या नहीं ?
इस विषय पर गुरु जी का उत्तर श्रेष्ठतम आया । श्री श्री बोले मूर्ति पूजा जरूरी है चित्त को एकाग्र करने के लिये, यदि चित्त एकाग्र है और तदात्म स्थापित हो गया है तो इसकी आवश्यकता नहीं। जैसे बस में हम चढते हैं और गंतव्य आने पर उतर जाते हैं, कुछ कुछ ऐसा ही मूर्ति पूजन के बारे में है। ईश प्राप्ति तक अवलम्बन लेना कोई बुरी बात नहीं लेकिन मंजिल प्राप्त होने पर भी बस में बैठे रहना कहाँ की बुद्धिमानी है । आप कहेंगे कि उतरना ही था तो चढे क्यों ? एक का ही पालन करते, मगर हमारा उद्देश्य लक्ष्य की प्राप्ति है ना कि अडियलपन । समझे कि नहीं!

जय गुरुदेव!

सोमवार, 20 जुलाई 2009

कबीर के दोहे:-

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह । जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥
माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय । एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर । कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥
तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय । कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥
गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥
सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद । कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥
साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय । मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥
कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और । हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर । आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय । हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥
बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥
साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥
साँई इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय ।मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भुखा जाय॥
जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥
उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥
सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥
साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥

शनिवार, 18 जुलाई 2009

महाकवि त्रिलोचन की सलाह:-

पृथ्वी से
दूब की कलाएं लो
चार
उषा से
हल्दिया तिलक
लो
और
अपने हाथों में
अक्षत लो
पृथ्वी आकाश
जहां कहीं
तुम्हें जाना हो
बढ़ो
बढ़ो
('अरघान' नामक संग्रह से )

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009



कबीर का सच


कुमार गन्धर्व के स्वर में अलौकिक आनंद - महसूस करिये :-


उड जायेगा हंस अकेला -2


The Swan will fly away all alone,


जग दर्शन का मेला


Spectacle of the world will be a mere fair


जैसे पात गिरे तरुवर के


As the leaf that falls from the tree


मिलना बहुत दुहेला
Is difficult to find


ना जाने किधर गिरेगा


Who knows where it will fall


लग्या पवन का रेला


Once it is struck with a gust of wind


जब होवे उमर पूरी


When life span is complete


तब छूटेगा हुकुम हुजूरी


Then listening to orders, following others will be over


यम के दूत बडे मरदूत


The messengers of Yama are very strong


यम से पडा झमेला


It's an entanglement with Yama


दास कबीर हर्षे गुन गावै


Servant Kabir Praises the attributes of the Lord


बाहर कोई पार न पावै


outside no one will know that he finds the Lord soon


(Internal everlasting plearsure)


गुरू की करनी गुरू ज़ायेगा


Guru will go according to his doings


चेले की करनी चेला।


The disciple according to his.

बिजली का तार चिडिया का झुला

आज प्रातः ही एक नन्ही चिडिया के शोर से जागकर देखा तो वो कल ही लगे तार पर झूल रही थी, जो एक की बजाय तीन फेज करने के चक्कर में लगा था। मैने सोचा तार लग गया अब एसी लगेगा, चिडिया ने सोचा तार लग गया अब झूला झूलेंगे। सावन जो है। ...... अपना अपना नजरिया।

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

आयुर्वेद का एक स्तम्भ ढ्हा

आयुर्वेद का एक स्तम्भ प्रो0 राम जी कन्नौजिया - ढ्हा, दर असल लखनऊ राजकीय आयुर्वेद कालेज के कार्यवाहक प्राचार्य, 89 मे BHU से MD ततपश्चात अतर्रा बान्दा में काय चिकित्सा के शिक्षक, प्रगति करते करते, यहाँ तक पहुँचे, सावन के पहले सोमवार को कालेज मे अपने विभागीय कक्ष में, प्रातः 10.15 बजे जबरदस्त हृदयाघात से, पार्थिव शरीर को छोड्कर गोलोकवासी हो गये। समाचार पत्रों के द्वारा ज्ञात हुआ कि उनका अंतिम संस्कार भैंसाकुंड लखनऊ मे मंगलवार को प्रातः होगा। वे अपने पीछे चार बच्चे व पत्नी को छोड गये।
निहायत शरीफ और शांत स्वभाव के थे। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे तथा परिवारजनों को अपार दु:ख सहने की शक्ति प्रदान करे।